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JDU का नाम बदलना लगभग तय, 3 बड़े फैक्टर:निशांत को पार्टी सौंपने से पहले ‘नीतीश’ की विरासत लॉक करने का मास्टर प्लान; 6 सवाल-जवाब में

By देश | दैनिक भास्कर
September 13, 2026 4 Min Read
Comments Off on JDU का नाम बदलना लगभग तय, 3 बड़े फैक्टर:निशांत को पार्टी सौंपने से पहले ‘नीतीश’ की विरासत लॉक करने का मास्टर प्लान; 6 सवाल-जवाब में
JDU का नाम 'जनता दल नीतीश' करने का सुझाव देकर संजय झा ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी है। क्या निशांत कुमार को पार्टी सौंपने से पहले नीतीश की विरासत को लॉक करने का मास्टर प्लान है? आखिर नाम बदलने के पीछे का बड़ा गेम प्लान क्या है? क्या वाकई नाम बदलेगा, समझेंगे; बूझे की नाही में...। सवाल-1ः JDU का नाम बदलने का पूरा मामला क्या है? जवाबः 10 सितंबर को खगड़िया में ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने पार्टी का नाम 'जनता दल नीतीश' करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, 'नीतीश कुमार के राजनीतिक योगदान और विचारधारा को सम्मान देने के लिए जनता दल (यूनाइटेड) का नाम बदलकर 'जनता दल (नीतीश)' या 'JD(U)-Nitish' कर दिया जाना चाहिए।' सवाल-2ः संजय झा का बयान क्या पार्टी में टूट की तरफ इशारा है? जवाबः बिल्कुल नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, JDU में सब ठीक है। पार्टी पूरी तरह एकजुट है। अगर टूट या गुटबाजी होती तो संजय झा के इस सुझाव का विरोध होता। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। अब तक किसी नेता ने इस पर कोई टिका-टिप्पणी नहीं की है। दरअसल… पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘नीतीश कुमार राज्यसभा जाने के बाद राजनीति से लगभग रिटायर हो गए हैं। निशांत कुमार आगे की राजनीति करेंगे। यह डिमांड संजय झा ने की है।’ अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘चूंकि मार्च में जब नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का ऐलान किया तब से पार्टी के पुराने कार्यकर्ता और नीतीश समर्थक संजय झा सहित उनके इर्दगिर्द के नेताओं से अंदरखाने नाराज हैं। वह मानते हैं कि मुख्यमंत्री पद छुड़वाने में इन लोगों का हाथ है। इसी दाग को कम करने के लिए संजय झा ने सार्वजनिक रूप से यह दांव चला है।’ सवाल-3: आखिर JDU का नाम क्यों बदलना चाहते हैं नेता? जवाबः इसके पीछे 3 बड़ी स्ट्रेटजी है। सिलसिलेवार तरीके से जानिए… 1. विरासत की लड़ाई खत्म होगी, निशांत की राह आसान होगी सूत्रों के मुताबिक, नीतीश कुमार के बिहार से दिल्ली जाने के बाद उनकी विरासत को लेकर अंदरखाने बहुत खींचतान है। समय-समय पर राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा उनकी विरासत पर दावा करते हैं। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद CM बने सम्राट चौधरी स्वभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर उभरे हैं। 2. ब्रांड नीतीश को मजबूत कर फायदा उठाना बिहार में JDU का आधार ही नीतीश कुमार की 'सुशासन' और विकास पुरुष वाली छवि है। पार्टी का मानना है कि 'जनता दल' शब्द तो पहले के कई धड़ों (जैसे जनता दल सेक्युलर, जनता दल यूनाइटेड) के पास रहा है, लेकिन 'नीतीश' जोड़ने से पार्टी की अपनी अलग पहचान स्थापित होगी। रणनीतिकार इसके 2 बड़े उदाहरण बताते हैं… पहला- बीजू जनता दल (BJD) दूसरा- वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) JDU के रणनीतिकार और नेता ओडिशा के नवीन पटनायक मॉडल से खुद की पार्टी और निशांत कुमार की राजनीतिक स्थिति को जोड़ते हैं। उन्हें उम्मीद है कि नीतीश कुमार का नाम जुड़ने से पार्टी मजबूत होगी। 3. वोट बैंक और पार्टी एकजुट रहेगी अंदरखाने पार्टी का मानना है कि वोटर JDU से ज्यादा 'नीतीश कुमार' से जुड़े हैं। पार्टी के नाम में स्पष्टता आने से ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे वोटरों के लिए पार्टी की पहचान बहुत आसान और सीधी हो जाएगी। पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, 'नीतीश कुमार के बाद पार्टी में बिखराव की आशंकाओं को रोकने के लिए नाम में ही उनका ठप्पा लगा दिया जा रहा है। इससे भविष्य में कोई भी नया नेता पार्टी पर अपना दावा करे, तो नीतीश कुमार की विरासत के तहत ही काम करना पड़ेगा।' सवाल-4: क्या वाकई JDU का नाम बदलेगा? जवाबः ज्यादा संभव है। चूंकि अब तक किसी नेता ने इससे इनकार नहीं किया है। खास बात है कि पार्टी सुप्रीमो नीतीश कुमार, उनके बेटे निशांत कुमार, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह सरीखे कई सीनियर नेताओं ने इस पर अभी तक कोई टिका-टिप्पणी नहीं की है। 13 सितंबर के बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के पोस्ट से साफ संकेत है कि पार्टी के अंदर नाम बदलने पर लगभग आम सहमति है। सवाल-5ः क्या सिर्फ बयान देने से नाम बदल जाएगा, प्रोसेस क्या है? जवाबः नहीं। नेताओं के सिर्फ बयान देने से पार्टी का नाम नहीं बदल जाएगा। JDU के संविधान के मुताबिक, पार्टी के नाम, उद्देश्य या नीति-नियमों में परिवर्तन करने की शक्ति केवल पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के पास है। नाम बदलने के लिए 6 स्टेप्स हैं... सवाल-6: …तो क्या पार्टी का सिंबल तीर भी बदलेगा? जवाबः नहीं। राजनीतिक दल का नाम बदलने पर पार्टी का पुराना चुनाव चिह्न अपने आप खत्म नहीं होता है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव चिह्न (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 के तहत नियम स्पष्ट हैं... सिंबल जब्त तब होता है... जब किसी पार्टी में दो गुट बन जाते हैं और दोनों मूल पार्टी के नाम और चिह्न पर दावा करते हैं, तब चुनाव आयोग चिह्न को फ्रीज (जब्त) कर सकता है। इसके बाद दोनों गुटों को नए नाम और नए चुनाव चिह्न आवंटित किए जाते हैं। जैसे- लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का मामला है। 2021 में चिराग पासवान की पार्टी दो गुटों में बंट गई। चिराग गुट और पारस गुट। दोनों ने लोक जनशक्ति पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश किया। नतीजा-नाम और सिंबल दोनों जब्त हो गया। अब दोनों अलग-अलग सिंबल और पार्टी के नाम से चुनावी मैदान में हैं। JDU में अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं है। इसलिए सिंबल बरकरार रहेगा।
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