जस्टिस भुइयां बोले- प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई बेहद दुखद:पुलिस का रवैया बदलना जरूरी; कस्टडी में मौत और फर्जी एनकाउंटर गंभीर अपराध
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, ‘जब IPS अधिकारी खुद प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखाई देते हैं, तो यह बेहद दुखद है।’ उन्होंने यह बात रिटायर आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद की पुस्तक 'पुलिसिंग द रिपब्लिक' के विमोचन कार्यक्रम में कही। जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘पुलिस से जिस निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है, वह कहीं गायब होती दिख रही है। पुलिस को अपना रवैया बदला होगा। हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर गंभीर अपराध हैं।’ जस्टिस भुइयां के इस बयान को पिछले दिनों हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है। यहां संसद मार्च के दौरान पुलिस के साथ झड़प में कई प्रदर्शनकारी जख्मी हुए थे। पैलेट गन चलाने का आरोप भी लगा है। जस्टिस भुइयां बोले- पुलिस पर भरोसा बनाए रखना जरूरी, 5 बातें 1. लोग पुलिस के पास मदद के लिए जाते हैं: 'सड़क पर तैनात पुलिसकर्मी आम लोगों के लिए राज्य की शक्ति का प्रतीक होता है। किसी परेशानी में नागरिक मदद के लिए पुलिस के पास जाता है, इसलिए पुलिस पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है।' 2. पुलिस अमीनवीय व्यवहार नहीं कर सकती: सभ्य समाज में हिरासत में मौत बेहद गंभीर अपराध है। किसी भी स्थिति में पुलिस किसी व्यक्ति के साथ यातना या अमानवीय व्यवहार नहीं कर सकती। 1997 के डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल मामले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के बाद भी नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म नहीं होते। 3. सरकारी अफसर कानून तोड़ेंगे तो भरोसा कम होगा: उन्होंने सवाल किया कि क्या पुलिस की गिरफ्तारी के बाद किसी व्यक्ति का जीवन का अधिकार खत्म हो जाता है? उन्होंने कहा, इसका जवाब साफ है- नहीं। डीके बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और पूछताछ के दौरान पुलिस के लिए कई नियम तय किए थे। मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पीड़ित को मुआवजा देने की बात भी कही गई थी। जब सरकारी अधिकारी ही कानून तोड़ते हैं, तो लोगों का कानून पर भरोसा कम होता है और अराजकता बढ़ती है। सभ्य समाज में ऐसी स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती। 4. सिफारिशें अब तक लागू नहीं: 1977 में बने राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने पुलिस व्यवस्था और नागरिकों के अधिकारों पर कई सुझाव दिए थे। आयोग ने मई 1981 में अपनी अंतिम रिपोर्ट दी थी। आयोग ने पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जांच और पुलिस को पेशेवर स्वतंत्रता देने की सिफारिश की थी, लेकिन इन्हें लागू नहीं किया गया। 5. दबाव से शासन कमजोर: राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव पुलिस का गलत इस्तेमाल करवा सकता है और कानून का शासन कमजोर कर सकता है। ---------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… SC बोला- लॉ स्टूडेंट्स पर बार काउंसिल एक्शन नहीं ले सकता, CJI को बुलाने के विरोध के बाद छात्रों का एनरोलमेंट रोका था सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि छात्रों के आचरण पर कार्रवाई करने का अधिकार उनके यूनिवर्सिटी या संबंधित शैक्षणिक संस्थान के पास है। पूरी खबर पढ़ें…