राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक बेहद संवेदनशील मामले में 16 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को 27 सप्ताह 4 दिन (करीब 7 महीने) के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दे दी है। जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकल पीठ ने 22 मई को पीड़ित के शारीरिक, मानसिक और संवैधानिक अधिकारों को सर्वोपरि मानते हुए यह फैसला सुनाया है। कोर्ट के आदेश के बाद जोधपुर कलेक्टर आलोक रंजन ने 22 मई को सीएमएचओ को नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिया और पीड़ित को सिरोही से जोधपुर शिफ्ट करने के लिए एम्बुलेंस रवाना की। सिरोही जिले का मामला, अहम रही मेडिकल रिपोर्ट इस मामले में पीड़ित के दादा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। सिरोही जिले के एक थाना क्षेत्र में नाबालिग के साथ हुए रेप और पॉक्सो के तहत मामला दर्ज किया गया था। जब तक परिवार को घटना और गर्भावस्था का पता चला, तब तक गर्भ 27 सप्ताह 4 दिन (करीब सात महीने) का हो चुका था। याचिका दायर होने पर कोर्ट ने पहले सिरोही और फिर डॉ. एस.एन. मेडिकल कॉलेज जोधपुर में एक एक्सपर्ट मेडिकल बोर्ड का गठन करवाया। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि पीड़ित को गंभीर एनीमिया है और गर्भ 7 महीने का है जिसमें जोखिम है, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर्स की निगरानी में अबॉर्शन किया जा सकता है। ‘मजबूर करना अनुच्छेद-21 का उल्लंघन’ याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सपना वैष्णव ने पैरवी की, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यह गर्भावस्था रेप का परिणाम है। एक नाबालिग को इस अनचाहे गर्भ को धारण करने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वायत्तता, प्रजनन अधिकारों और गरिमा का सीधा हनन है। सुनवाई के दौरान जब नाबालिग पीड़ित से पूछा गया, तो उसने भी खुद अदालत के सामने इस गर्भ को समाप्त कराने की इच्छा जताई। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता के सहयोगी एडवोकेट शेरसिंह राठौड़ उपस्थित हुए। कोर्ट ने… मामले की गंभीरता को देखते हुए एस.एन. मेडिकल कॉलेज जोधपुर से संबद्ध ‘हॉस्पिटल’ को सुरक्षित गर्भपात (मेडिकल टर्मिनेशन प्रक्रिया) कराने के निर्देश दिए। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस पूरी प्रक्रिया में पीड़ित के इलाज, दवा, यात्रा और परिवार के रुकने व खाने-पीने का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। भविष्य की कानूनी कार्रवाई के लिए भ्रूण के डीएनए और फॉरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट के आदेश की पालना में जोधपुर कलेक्टर आलोक रंजन ने जोधपुर सीएमएचओ को नोडल अधिकारी नियुक्त किया। उन्हें मेडिकल रिलीफ सोसायटी के माध्यम से सारा खर्च वहन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अलावा हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामलों में गर्भावस्था परीक्षण और मेडिकल प्रक्रिया में जान-बूझकर देरी (सिस्टमैटिक देरी) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) की सख्त जरूरत है। एसओपी तय करने के बड़े मुद्दे पर अब जुलाई के पहले सप्ताह में फिर से सुनवाई होगी।
