सुप्रीम कोर्ट बोला-पुलिस प्रदर्शन के दौरान युवाओं की बात सुने:पत्थरबाजी होने पर भी उन्हें समझाएं; संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा का मामला
सुप्रीम कोर्ट ने संसद मार्च हिंसा को लेकर बुधवार को कहा कि प्रदर्शनों के दौरान कानून लागू करने वाली एजेंसियों को संयम बरतना चाहिए। अगर कुछ गुमराह लोग पत्थरबाजी भी करते हैं, तो भी पुलिस को युवाओं को शांत करने, उन्हें समझाने और उनकी बात सुनने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट 20 जुलाई के संसद चलो मार्च के आयोजकों पर कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई को तैयार हो गया है। इसमें आयोजकों पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका ने संसद मार्च बुलाया था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इसे ऐसी ही दूसरी याचिका के साथ जोड़ दिया है। यह याचिका एक रिटायर्ड एयरफोर्स अधिकारी मनीष कुमार सोलंकी ने दायर की है। आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने कहा कि घटना को 15 दिन बीत चुके हैं, लेकिन आयोजकों की जवाबदेही तय नहीं हुई। उनका आरोप था कि आयोजक लगातार सार्वजनिक मंचों पर भड़काऊ बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ऐसे मामलों में पीछे हटती है तो यह गलत उदाहरण बनेगा और भविष्य में दूसरे राज्यों में भी हिंसक प्रदर्शन को बढ़ावा मिल सकता है। वकील ने दलील दी कि पत्थरबाजी करने वालों को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि सरकार की ओर से कहीं कोई गलती हुई हो। उन्होंने संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताते हुए कहा कि यदि प्रदर्शनकारी संसद परिसर तक पहुंच जाते और कोई बड़ी घटना हो जाती, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। उनके अनुसार हिंसा में शामिल हर व्यक्ति की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि ताकतवर सरकार की ओर से आक्रामक रवैया अपनाने से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और हिंसा और भड़क सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसे युवाओं को सलाह, काउंसलिंग और संवाद की जरूरत है। सबसे प्रभावी तरीका उनकी बात सुनना और यह समझना है कि वे आखिर विरोध क्यों कर रहे हैं। पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान कोई अप्रिय घटना होती है तो पुलिस को भी अत्यधिक संयम बरतना चाहिए, ताकि हालात नियंत्रण से बाहर न जाएं। अदालत ने कहा कि हर स्थिति से सावधानीपूर्वक निपटना जरूरी है, जिससे युवा हिंसा की ओर न बढ़ें और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी सुरक्षित रहे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मौके की परिस्थितियों से निपटने का तरीका तय करना कानून लागू करने वाली एजेंसियों का अधिकार है और वे ऐसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से संभालना जानती हैं। याचिका में अदालत से यह भी मांग की गई है कि पुलिस और सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। साथ ही उन्हें सामुदायिक सेवा (कम्युनिटी सर्विस) करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। खबर को लगातार अपडेट कर रहे हैं।