शहर के प्रमुख सरकारी कार्यालयों में दिव्यांगजन के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। जहां रैंप बने हैं, वहां तक पहुंचना ही चुनौती है। कई भवनों में रैंप या तो मानकों के अनुरूप नहीं हैं या उनके सामने पार्किंग कर दी गई है। इससे दिव्यांगजन को अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। दैनिक भास्कर ने इस बड़ी परेशानी पर नजर डाली। सामने आया कि कलेक्ट्रेट परिसर में तीन रैंप बने हैं, लेकिन तीनों के आगे वाहन खड़े रहते हैं। ऐसे में किसी भी व्हीलचेयर उपयोगकर्ता को वाहनों के बीच से रास्ता बनाकर रैंप तक पहुंचना पड़ता है। यह स्थिति न केवल असुविधाजनक, बल्कि जोखिम भरी भी है। दोनों एडीएम कार्यालय (सिटी व प्रशासन) में रैंप तो बने हैं, लेकिन इनके सामने पार्किंग होने से उनका उपयोग लगभग असंभव है। यहां भी समस्या – जिला परिषद कार्यालय में प्रवेश के लिए रैंप बना है, फिर भी उसके आगे वाहन खड़े होने से स्थिति कलेक्ट्रेट जैसी ही बनी हुई है। समस्या केवल प्रवेश तक सीमित नहीं है। अधिकांश अधिकारी दूसरी मंजिल पर बैठते हैं, जहां लिफ्ट या वैकल्पिक सुलभ व्यवस्था नहीं होने से दिव्यांगजन के लिए वहां तक पहुंचना संभव नहीं है। जिला पुलिस अधीक्षक और पुलिस महानिरीक्षक कार्यालयों में रैंप की व्यवस्था ही नहीं है। ये है कानून – देश में दिव्यांगजनों की सुलभता को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 44 से 46 के तहत सभी सार्वजनिक भवनों को सुलभ बनाना अनिवार्य है। नए भवनों को सुलभता मानकों का पालन किए बिना पूर्णता प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार की 2021 की हार्मोनाइज्ड गाइडलाइंस के अनुसार रैम्प की ढलान 1:12, न्यूनतम चौड़ाई 1.2 मीटर, दोनों ओर हैंडरेल, हर 5 से 9 मीटर पर समतल लैंडिंग और फिसलन-रोधी सतह अनिवार्य है। दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए टैक्टाइल टाइल्स और स्पष्ट साइन बोर्ड भी जरूरी हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर नियमों का पालन नहीं हो रहा है। व्यवस्था की संवेदनहीनता समाज की प्रगति उसके सबसे कमजोर नागरिक की गरिमा से मापी जाती है। कानून और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद सार्वजनिक स्थानों पर सुलभता आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुलभता का अभाव संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसके बावजूद सरकारी भवनों में रैंप, लिफ्ट और सुलभ सुविधाघर जैसी बुनियादी सुविधाओं का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। दिव्यांगजन मुख्य आयुक्त या राज्य आयुक्त (दिव्यांगजन) के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकते हैं। शहर में सुलभता का अभाव यह संकेत देता है कि कानून कागजों तक सीमित है, जबकि जमीनी हकीकत में दिव्यांगजन आज भी बाधाओं से जूझने को मजबूर हैं। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. अरविंदर सिंह
