नमस्कार घोड़ों को काबू में करने में माहिर विधायकजी अफसरों से पिट गए। इस पर नेता प्रतिपक्ष ने चुटकी ले ली। कोटा में स्पीकर महोदय ने किस्सा सुनाया। बोले-काम के लिए केंद्रीय मंत्री के चक्कर काटने पड़े। सांचौर में रानीवाड़ा विधायकजी घायल को लेकर हॉस्पिटल पहुंचे, वहां ताला लटका मिला और हिंडौन अस्पताल में घुसे डिजिटल क्रांतिकारी ने करप्शन की पोल खोल दी। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. विधायकजी को मीटिंग में अफसर ने पीटा विधायकजी घोड़ों के शौकीन हैं। घोड़ों का प्रदर्शन करते हैं। कभी-कभी घोड़े पर ही शहर का दौरा कर लेते हैं। कोई घोड़ा बिदक जाए तो लगाम खींचकर काबू भी कर लेते हैं। लेकिन जिले के अफसरों को विधायकजी काबू नहीं कर पाए। मामला श्रीगंगानगर का है। यहां पेयजल का संकट है। इसी को लेकर एक मीटिंग बुलाई थी। मीटिंग में विधायकजी टाइम पर पहुंच गए। लेकिन अफसरों का अता-पता नहीं। एक घंटे बाद फोन मिलाया तब पहुंचे। गुस्से में विधायकजी ने भला-बुरा कह सुनाया। विधायकजी का आरोप है कि अफसर बिगड़ गए। एक ने कॉलर पकड़ लिया और दूसरे ने पीट दिया। चश्मा टूट गया। आंख के नीचे चोट लग गई। हालांकि, अफसरों ने भी पलटकर आरोप लगाए। कहा- बल्कि हमें पीटा गया। पीटकर नई शर्ट पहनाकर पुलिस के हवाले कर दिया। घटना पर नेता प्रतिपक्ष जूली जी ने भी चुटकी ले ली। बोले- अब तो विधायक ही सुरक्षित नहीं हैं। विधायकों के साथ अधिकारी मारपीट कर रहे हैं। हालांकि, शिकायत पर पुलिस ने अफसरों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन चर्चा यही है कि विधायकजी सिर्फ घोड़ों को ही काबू कर सकते हैं। 2. स्पीकर महोदय ने सुनाया किस्सा कई बार बड़ों-बड़ों का नंबर नहीं लगता। आम आदमी की क्या बिसात? लोकसभा स्पीकर महोदय अपने संसदीय क्षेत्र में थे। सामने जनता बैठी थी। सभा चल रही थी। स्पीकर महोदय को पता नहीं क्या सूझी। जनता से बोले- एक किस्सा सुनाता हूं। फिर उन्होंने किस्सा सुनाना शुरू किया- एक बार मैं सांसद था। मेरे मित्र खेल मंत्री थे। कोटा-बूंदी में स्टेडियम और एस्ट्रो टर्फ बनवाने के लिए मंत्रीजी ने मुझे चक्कर कटा दिए। मैं थैला लेकर उनके पीछे घूमता रहा। वे कहते-आज नहीं कल, कल नहीं परसों। इसी तरह उन्होंने 5 साल निकाल दिए, लेकिन काम नहीं हुआ। आखिर मंत्रीजी का समय समाप्त हुआ और मेरा वक्त आ गया। अब देखिए, जहां साढ़े 4 करोड़ का एक काम नहीं हो रहा था, वहां 7 काम हो रहे हैं। चार तो पूरे हो गए, तीन पाइपलाइन में हैं। बूंदी में 20 करोड़ का स्टेडियम बन गया है। जनता के सामने स्पीकर जी ने किस्सा जरूर सुनाया, लेकिन अब चर्चा यही है कि कौन थे वो मंत्री महोदय? 3. विधायक ने घायल को हॉस्पिटल पहुंचाया, लेकिन.. सिस्टम सर्व शक्तिमान है। सिस्टम के आगे किसी की नहीं चलती। बड़े बड़े रसूख भी सिस्टम के सामने पानी मांगते हैं। जालोर के रानीवाड़ा से विधायक रतन देवासी सांचौर में कार से गुजर रहे थे। देखा कि आगे सड़क पर भीड़ लगी है। युवक बेसुध पड़ा है। बाइक गिरी पड़ी है। विधायकजी कार से उतरे और घायल को संभाला। पुलिस को फोन किया। कार से घायल को नजदीकी सांकड़ पीएचसी भिजवाया। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। किसी काम की सफलता-असफलता की पड़ताल करनी हो तो फीडबैक लेना चाहिए। फीडबैक लेने विधायक जी सांकड़ पीएचसी पहुंच गए। देखा कि वहां घायल जमीन पर बैठा है। पुलिस जख्मों का मुआयना कर रही है। हॉस्पिटल के मेन गेट पर ताला जड़ा है। विधायकजी सिस्टम को कोसने लगे। बोले- कमाल है। स्टाफ नहीं है। ताला लगा है। ऐसे कैसे काम चलेगा? फिर किसी अधिकारी को फोन लगाकर उलाहना देने लगे। कहा- डॉक्टर साहब ये पीएचसी ऐसे ही बंद रहती है क्या? 4. चलते-चलते.. डिजिटल क्रांतिकारी मोबाइल का कैमरा ऑन करके हिंडौन के सरकारी हॉस्पिटल में घुस में गया। वीडियो बनाता हुआ वह जनाना वार्ड में दाखिल हुआ। किसी सनसनीखेज खबर की रिपोर्टिंग की तर्ज पर उसने छोटी सांस में लंबे वाक्य बोलते हुए कैमरा मरीजों और अटेंडेंट्स की तरफ घुमाया। बोला- आपसे किसी नर्स-वर्स ने पैसे मांगे? जवाब मिला- हां मांगे। सवाल- कितने मांगे? जवाब- 700 रुपए मांगे। सवाल- कहां मांगे? जवाब- इहां ही मांगे। इसके बाद क्रांतिकारी दूसरे बेड की तरफ गया- तुमसे मांगे? दूसरे लोग खामोश। इसके बाद क्रांतिकारी ने ही ऐलान सा किया-बिना पैसे लिए इहां डिलीवरी नहीं करते। मरीजों और अटेंडेंट्स ने उसमें रुचि नहीं ली। उसने मुद्दा बदला- एक भी गार्ड नहीं है इहां। 21 गार्ड की डिमांड का लेटर कलेक्टर को भेजा था। कहते हुए वह गेट से बाहर हो गया। हालांकि, अस्पताल के जिम्मेदारों का कहना है- आरोप निराधार हैं। इनपुट सहयोग- विशाल चतुर्वेदी (हिंडौन सिटी, करौली), काका सिंह (श्रीगंगानगर), शक्ति सिंह (कोटा)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी
