20 अप्रैल को पचपदरा रिफाइनरी में लगी आग के पीछे कोई साजिश नहीं थी। तकनीकी खामी और टेस्टिंग में लापरवाही से क्रूड डिस्टिलेशन यूनिट में आग भड़की। एनआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भास्कर को बताया कि ऐसा कोई पुख्ता सबूत या सुराग नहीं मिला है, जो किसी साजिश की ओर इशारा करे। एजेंसी मैनुअल छेड़छाड़, डिजिटल हैकिंग और ग्लोबल सेबोटाज पैटर्न को केंद्र में रखकर जांच कर रही है, लेकिन अब तक इनसे जुड़ा कोई संदेहास्पद लिंक नहीं मिला है। वहीं, तकनीकी जांच में प्रांरभिक तौर पर रिफाइनरी के निर्माण से जुड़ी कई गंभीर खामियां सामने आई हैं। आशंका है कि सीडीयू की इनलेट लाइन पाइप, वॉल्व और बाकी उपकरण कार्बन स्टील के थे। जबकि मानकों के अनुसार ये पी-5 अलॉय स्टील के होने चाहिए। जांच में ऑटोमैटिक सेफ्टी वॉल्व के फेल होने की पुष्टि हुई है। ऐसे में आग बुझाने में समय लगा। रिफाइनरी में तैनात स्टाफ की प्रोफाइलिंग से खुलासा हुआ है कि घटना के समय की शिफ्ट में काम करने वाले इंजीनियर अनुभवी नहीं थे। एचपीसीएल की रिफाइनरी में इस तरह की खामियां होना नई बात नहीं है। 5 साल पहले, 25 मई 2021 को विशाखापट्टनम रिफाइनरी के सीडीयू 3 यूनिट में भी ठीक इसी तरह से आग लगी थी। इसकी वजह जानने के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय के ऑयल इंडस्ट्री सेफ्टी डायरेक्टरेट ने इसकी केस स्टडी की थी। आग के लिए घटिया कार्बन स्टील, ऑटोमैटिक वॉल्व और स्प्रिंकलर को जिम्मेदार माना था और देशभर की रिफाइनरी में इन्हें ठीक करने की सिफारिश की थी। सवाल यह है कि 5 साल पहले आई रिपोर्ट को 79 हजार करोड़ के पचपदरा प्रोजेक्ट में लागू क्यों नहीं किया गया? यूनिट की गुणवत्ता सवालों के घेरे में, हर स्तर पर खामी मिली 1. यूनिट में अलॉय की जगह सस्ती वाली कार्बन स्टील लगाई गई
सीडीयू की इनलेट लाइन क्रूड ऑयल से पेट्रोल, डीजल और गैस निकलने के बाद डामर जैसे गाढ़े पदार्थ ‘वैक्यूम रेजिड्यू’ शिफ्ट करती है। यह ठंडा होने पर जम जाता है, इसलिए इसे करीब 350°C से 400° तक गर्म किया जाता है। इसमें लगे पाइप और वॉल्व आदि पी 5 अलॉय स्टील से बने होने चाहिए। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इसकी जगह तीन से चार गुना तक सस्ती कार्बन स्टील लगाई गई। जैसे ही खौलते हुए वैक्यूम रेजिड्यू आगे बढ़ा, गेज टैपिंग पॉइंट से फव्वारे की तरह निकलने लगा और हवा के संपर्क में आते ही आग लगी। 2. तेल रिफाइन यूनिट में घटिया ऑटोमैटिक सेफ्टी वाल्व लगाया
सीडीयू में रिमोट ऑपरेटेड शट-ऑफ वॉल्व लगे थे। गेज टैपिंग पॉइंट से वैक्यूम रेजिड्यू लीक होते ही इसे एक्टिव होना चाहिए था। ये स्मार्ट वॉल्व होते हैं। जैसे ही लीकेज या प्रेशर कम होने का पता चलता है, ये अपने आप बंद हो जाते हैं ताकि पीछे से आ रहा हजारों लीटर वैक्यूम रेजिड्यू आग से बच जाए। 20 अप्रैल को ये वॉल्व ऐन मौके पर धोखा दे गए। ये वैक्यूम रेजिड्यू की सप्लाई को नहीं रोक पाए। इसे मैनुअल तरीके से रोक गया। इसीलिए आग को काबू पाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। वाटर रिंग्स और स्प्रिंकलर भी सिस्टम बेअसर रहा। हालांकि फायर-प्रूफ कोटिंग ने ठीक काम किया, जिससे स्ट्रक्चर गिरने से बच गया। 3. हाइड्रो-टेस्टिंग में एसओपी का पालन नहीं, वॉल्व में पैचवर्क किया
इनलेट लाइन की हाइड्रो-टेस्टिंग एसओपी के अनुसार नहीं हुई। इसमें पानी डालकर 1.5 गुना ज्यादा दबाव चेक किया जाता है। इस दौरान प्रेशर गेज हटा लिए जाते हैं। टेस्ट पास होने के बाद पाइप सुखाकर, गेज वापस लगाए जाते हैं और गैस डालकर फाइनल लीक टेस्ट होता है। यह काम कुछ हफ्तों में पूरा हो जाना चाहिए। जांच में आया कि पचपदरा में कई महीने से टेस्टिंग चल रही थी। यह संदेह हो रहा है कि क्या लाइन-वॉल्व बार-बार प्रेशर टेस्ट में फेल हो रही थे? क्या ठीक करने की जगह पैचवर्क किया गया?
