स्कूली शिक्षा की असली लड़ाई अब बजट या भवनों के साथ-साथ प्रशासनिक मॉडल की भी हो चुकी है। हालांकि इस मामले में राजस्थान पिछड़ता ही जा रहा है। शिक्षा विभाग की सबसे मजबूत धुरी डीईओ (जिला शिक्षा अधिकारी) अब भी प्रमोशन-आधारित ढांचे पर निर्भर है और इसका असर आंकड़ों में दिखता है। गुजरात, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु सहित आधा दर्जन राज्यों ने डीईओ को प्रोफेशनल प्रशासनिक कैडर में बदलकर व्यापक सुधार किए। यहां पुरानी व्यवस्था बरकरार है। ऐसे में अन्य राज्यों के मुकाबले बोर्ड परीक्षाओं में 10 फीसदी तक रिजल्ट गिरा और ड्रॉप आउट भी तेजी बढ़ा। वर्ष 2023 के बोर्ड परिणामों के अनुसार महाराष्ट्र और तमिलनाडु 90%+ के स्तर पर, गुजरात लगभग 89% और राजस्थान 82-84% पर है। यह अंतर बताता है कि स्कूल स्तर पर पढ़ाई की गुणवत्ता और परीक्षा तैयारी दोनों में गैप बना हुआ है। शिक्षा मंत्री का कहना है कि हमारे यहां भी ऐसा मॉडल प्रस्तावित है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें सबसे बड़ा सवाल अब राजनीतिक है कि क्या सरकार शिक्षा में ‘स्ट्रक्चरल रिफॉर्म’ चाहती है? राजस्थान में शिक्षा पर बड़े बजट और योजनाएं जरूर हैं, लेकिन जिला स्तर पर उन्हें लागू करने वाला सिस्टम कमजोर है। नीतियों की घोषणा और जमीनी असर के बीच यही ‘DEO गैप’ सबसे बड़ी बाधा बनता जा रहा है। अगर DEO कैडर को प्रोफेशनल नहीं बनाया गया, तो नई शिक्षा नीति के लक्ष्य भी कागजों तक सीमित रह सकते हैं। सीधी भर्ती से युवाओं को इस पद पर आने का मौका मिलेगा और वे इस पद पर नवाचार कर सकेंगे। नई सोच और नए उत्साह के साथ सीधी भर्ती से जो डीईओ बनेंगे, वे अपनी प्रशासनिक क्षमता के जरिए शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव कर सकते हैं। वर्तमान में विभाग में डीईओ के 554 पद स्वीकृत हैं। तीन बड़ी बातों से जानिए
लर्निंग आउटकम में 5–10% का सीधा अंतर : नेशनल एचीवमेंट सर्वे 2021 के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु का औसत स्कोर 62–65% के आसपास है, महाराष्ट्र 58–60% और गुजरात 55–58% पर है। इसके मुकाबले राजस्थान 50–52% पर सिमटा हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार 5–10% का गैप सीधे तौर पर प्रशासनिक दक्षता, मॉनिटरिंग और जवाबदेही से जुड़ा होता है। जिन राज्यों में DEO “एजुकेशन मैनेजर” की तरह काम कर रहे हैं, वहां सीखने के नतीजे लगातार बेहतर हुए हैं। ड्रॉपआउट: राजस्थान में दोगुनी समस्या
शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली के वर्ष 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडु में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट की दर तीन प्रतिशत, महाराष्ट्र में चार प्रतिशत, गुजरात में पांच प्रतिशत तो राजस्थान में करीब सात प्रतिशत है। यानी राजस्थान में बच्चे स्कूल छोड़ने की दर लगभग दोगुनी है। यह सिर्फ सामाजिक या आर्थिक कारण नहीं, बल्कि कमजोर जिला-स्तरीय मॉनिटरिंग का भी संकेत है। राज्यों में अंतर देखिए, स्पष्ट दिखाई देगा अलग डेडिकेटेड कैडर वाले राज्य
गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि में DEO एक फुल-टाइम प्रशासनिक अधिकारी का पद है। इनकी भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग के जरिए होती है और बजट, योजना, मॉनिटरिंग में सीधी भूमिका और जवाबदेही रहती है। प्रमोशन आधारित सिस्टम वाले राज्य
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में DEO पद सीनियर शिक्षक/प्रधानाचार्य को प्रमोशन से भरे जाते हैं। इनका कोई अलग प्रशासनिक कैडर नहीं है। फैसलों में ऊपरी स्तर पर निर्भरता ज्यादा रहती है। अगर जिला शिक्षा अधिकारी को प्रोफेशनल नहीं बनाया गया, तो नई शिक्षा नीति के लक्ष्य भी कागजों तक सीमित रह सकते हैं डीईओ का पद क्यों अहम
जिला शिक्षा अधिकारी जिले का सबसे बड़ा शिक्षा प्रशासक होता है। स्कूलों की निगरानी, तृतीय श्रेणी शिक्षकों की नियुक्ति/ट्रांसफर, जिले में विभाग की योजनाओं के क्रियान्वयन, जिले के स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की जिम्मेदारी सहित जिले की पूरी शिक्षा व्यवस्था उसी के अधीन होती है। अभी यह है सिस्टम
राजस्थान में डीईओ पद 100% प्रमोशन बेस्ड होता है। इस पद पर मुख्य रूप से पहले सीनियर प्रिंसिपल पदोन्नति के जरिए डीईओ बनते हैं। वे शिक्षक बैकग्राउंड से आते हैं। इसमें उनका अनुभव और सेवा अवधि के आधार पर प्राथमिकता मिलती है। और बदलाव नहीं करने के पीछे का तर्क…
डीईओ बनने वाला करीब 20 साल से अधिक समय से शिक्षा विभाग में कार्यरत रहता है। ऐसे में उसको विभाग की समझ अच्छी तरह से हो जाती है। उनका ग्राउंड कनेक्ट रहता है और विभाग में मुख्य रूप से क्या-क्या परेशानियां होती हैं, इसकी भी उन्हें अच्छी समझ होती है। ऐसी स्थिति में सीधी भर्ती से जो नया डीईओ आएगा, उसको विभाग को समझने में समय लगेगा। प्रिंसिपल के लिए प्रमोशन के रास्ते बंद हो जाएंगे। क्योंकि अगर सीधी भर्ती की स्थिति बनती है तो डीईओ के वर्तमान में जो पद हैं, उनमें से आधे पद सीधी भर्ती में जाएंगे और आधे पद प्रमोशन के होंगे। इस कारण सीधी भर्ती का विरोध हो सकता है। शिक्षा मंत्री ने कहा- अभी अंतिम निर्णय बाकी
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का कहना है कि शिक्षा अधिकारी के पद पर सीधी भर्ती पर विचार किया गया है। अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। आखिरी 2-5 साल में डीईओ बनते हैं, कड़े फैसले नहीं लेते शिक्षा विभाग में डीईओ प्रमोशन से बनते हैं। डीईओ बनते समय शिक्षा अधिकारी के रिटायरमेंट में 2 से 5 साल ही रहते हैं। ऐसे में वे पद पर जरूरी काम तो करते हैं, लेकिन सख्त निर्णय नहीं ले पाते। वे सोचते हैं कि बाकी बची नौकरी बिना किसी परेशानी के पूरी हो जाए। इसलिए डीईओ के पद पर सीधी भर्ती की व्यवस्था होती है तो यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार के हिसाब से बड़ा निर्णय होगा। युवा आएंगे तो वे भरपूर ऊर्जा से काम करेंगे। सख्त निर्णय भी ले सकेंगे। हालांकि डीईओ के पद को आरएएस भर्ती से नहीं भरा जा सकता। क्योंकि आरएएस की ग्रेड पे 5400 है और डीईओ की ग्रेड पे 6800 है। आरएएस के पास पावर अधिक है, लेकिन ग्रेड पे डीईओ की अधिक है। ऐसे में सरकार को अलग से ही भर्ती के नियम बनाने पड़ेंगे। भास्कर एक्सपर्ट – राधेश्याम जाट, रिटायर उपनिदेशक, शिक्षा विभाग
